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कौआ

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कौआ काले रंग का एक पक्षी है। राजस्थानी भाषा में इसे ‘कागला’ तथा मारवाड़ी में ‘हाडा’ कहा जाता है। यह कबूतर के आकार का काला पक्षी है, जो कर्ण कर्कश ध्वनि ‘काँव-काँव’ करता है। कौए को बहुत उद्दंड, धूर्त तथा चालाक पक्षी माना जाता है। कौआ एक विस्मयकारक पक्षी है। इनमें इतनी विविधता पाई जाती है कि इस पर एक ‘कागशास्त्र’ की भी रचना की गई है। भारत में कई स्थानों पर काला कौआ अब दिखाई नहीं देता। बिगड़ रहे पर्यावरण की मार कौओं पर भी पड़ी है। स्थिति यह है कि श्राद्ध में अनुष्ठान पूरा करने के लिए कौए तलाशने से भी नहीं मिल रहे हैं। कौए के विकल्प के रूप में लोग बंदर, गाय और अन्य पक्षियों को भोजन का अंश देकर अनुष्ठान पूरा कर रहे हैं।

श्राद्ध में कौए का महत्त्व

 इसे अंधविश्वास माना जाए या फिर कुछ और कि आम दिनों में घर की खपरैल पर ‘कौआ’ की हाजिरी को बुंदेली अशुभ मान इन्हें ‘हाड़ी’ कह कर दुत्कारते हैं, पर पितृ पक्ष में एक पखवाड़ा इन्हीं कौओं से ‘दाई-बाबा’ का रिश्ता कायम कर पूर्वजों के श्राद्ध में ‘कौआ भोज’ आयोजित करते हैं. लोगों का मानना है कि पूर्वज कौआ का भी जन्म ले सकते हैं और ‘कौआ भोज’ से पुरखों को मोक्ष की प्राप्ति होगी. बुजुर्ग लोगों का मानना है कि पूर्वज कौआ का भी जन्म ले सकते हैं, कौवों को भोजन कराने से पुरखों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जल्दी ही उनका मानव के रूप में जन्म भी हो जाता है. खास बात यह है कि श्राद्ध की पूर्वसंध्या पर घर की बुजुर्ग महिला अपने आंगन से ऊंची आवाज लगाकर ‘दाई-बाबा’ को भोज में शामिल होने का आमंत्रण देती हैं और वही महिला श्राद्ध की सुबह कई प्रकार के पकवान बनाकर घर की खपरैल पर रख देती हैं, जिसे झुंड में पहुंचे कौआ खाते हैं. यहां यह बताना जरूरी है कि बुंदेलखंड में गंगापारी कम और सामान्य प्रजाति के कौआ ज्यादा पाए जाते हैं, अगर श्राद्ध के दिन एक भी गंगापारी कौआ इस भोज में शामिल हो गया तो उस परिवार के सदस्य इसलिए बेहद खुश होते हैं कि उनका पूर्वज मोक्ष प्राप्त कर वापस आया है

कमाल की याददाश्त

अपनी याददाश्त के बल पर कौवे अपने लिए सुरक्षित रखे गए भोजन के बारे में भी याद रखते हैं, जिसको भूख लगने पर वे प्रयोग कर लेते हैं। कुछ समय पहले ही कौओं की एक नयी प्रजाति खोजी गई है, जो रोजमर्रा की जरूरत के अनुसार अपने औजारों को भी प्रयोग करती रहती है। ये खाना प्राप्त करने के लिए सूखी डंडी या पत्ती को चोंच के सहयोग से किसी चतुर की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह भी देखा गया कि ये जोर से बंद नट्स को सड़क पर गिराकर किसी वाहन द्वारा उनको कुचल कर खोल दिए जाने का इंतज़ार भी करते हैं। ऑक्सफोर्ड विविद्यालय ने 2007 के अपने अध्ययन का नतीजा दिया था, जो न्यूकैलोडियन कौवों पर नन्हे कैमरे लगाकर पाए गए थे। पाया गया कि वे बहुत सी नयी चीजों को भी अपनी जरूरत पर औजार बना लेते हैं। खोदने, भुरभुरा या मुलायम करने, मोड़ने या कुछ मिलाकर नयी तरह का खाद्य तैयार करने में महारथी होते हैं। ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में ऐसे कौवों की प्रजाति भी मिली, जो कैन को खोलकर ड्रिंक पी सकते हैं।

संकटग्रस्त प्रजाति

वर्तमान समय में कौआ भी पक्षियों की संकटग्रस्त प्रजातियों में सम्मिलित हो गया है। पहले कौओं के झुण्ड के झुण्ड दिखाई देते थे, लेकिन अब इन्हें देख पाना कठिन हो गया है। आने वाले समय में शायद इस कहावत का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा कि- “झूठ बोले कौआ काटे”। ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ के वन्य जीव विभाग के डॉ. अफीफउल्ला कहते हैं कि प्रदूषण के साथ-साथ सिमट रही बायोडायवर्सिटी के कारण भी कौओं की संख्या तेजी से घटी है। वातावरण असंतुलन के कारण ही गौरैया और बया की तरह कौए लुप्त होने की कगार पर आ गए हैं। मानव की खान-पान की आदतें बदली हैं। कौए गंदगी खाते हैं। कूड़ा अब पालीथिन में फेंका जाता है। मरे हुए जानवरों की हड्डियों तक में केमिकल होते हैं। खेतों में कीटनाशकों के रूप में जहर फैला हुआ है। अध्ययन से पता चला है कि ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन जिन पशुओं में लगाए जाते हैं, उनकी मौत के बाद मांस खाकर पक्षियों की किडनी बर्बाद हो गई। वह पक्षी विलुप्ति की कगार पर आ गए। यही कौओं के साथ भी हुआ है। अब कौए के विकल्प के रूप में लोग बंदर, गाय और अन्य पक्षियों को भोजन का अंश देकर अनुष्ठान पूरा करने को विवश हो रहे हैं।

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